
आज फिर गुजरी हूँ
गोमती के उसी पुल से
जहाँ से आप और मै
सालों तक गुज़रते रहे
आपकी साईकिल पर आगे बैठी मै
दो चोटी और छोटी सी फ्राक पहने
पूछती रहती थी दुनिया भर के सवाल
छोटी छोटी बातों पर मचाती थी बवाल
और आप देते थे बिना थके सारे जवाब
कभी सच्ची बातें, कभी झूठे से ख्वाब
आज भी वही गोमती का किनारा
वही सड़कें वही नज़ारा
किनारे पर लगे हुए वही पेड़
वही बहती हुई नदी, वही मेड़
साईकिल की जगह कार है
परिवार का ढेर सारा प्यार है
आज मै बच्ची नहीं माँ हूँ
ढेर सारे रिश्तों का मान हूँ
सबकुछ है वैसा ही जैसा होना चाहिए
पर ये रास्ता आज भी रुलाता है
आपकी याद दिलाता है
वक़्त गुज़र गया पापा
पर कुछ यादें कभी नहीं गुज़रती