Sunday, September 6, 2015

जो तुम हँसते हो 
उमस दूर सी हो जाती है 
फिसल पड़ती है बूंदे 
आसमान की मुट्ठी से 
ज़रा सा  खिलखिला दो 
भीग जाऊं बारिश में 
आज टिपटिप नहीं 
रिमझिम की तलब है मुझको 

- रंजना डीन 

3 comments:

  1. आपकी यह छोटी सी कविता पढ़कर मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई। आपने किसी की हँसी को बारिश से जोड़कर बहुत प्यारा चित्र बना दिया। सच कहूँ, आपकी यह रचना पढ़कर लगा जैसे ठंडी हवा और हल्की बारिश एक साथ मन को छू गई हो।

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