Tuesday, July 24, 2012


ये बारिश हुई है
या आंसू है मेरे
जो बरसे हैं ऐसे
की थमते नहीं हैं
धुले जा रहे हैं
हर एक हर्फ़ मेरे
नमी है ग़मों की
ये जमते नहीं है

Saturday, July 7, 2012

दो जून की रोटी जो मयस्सर न हुई
तो खुदखुशी कर छोड़ दी दुनिया उसने
उसको क्या पता था कही पर बोरियों में
सड़ते पड़े हैं उसके उगाये गेंहू

Saturday, June 23, 2012




आज  बहुत  दिन  बाद  दिखा  आँगन  सूखा
पानी की एक बूँद नहीं और धूप चटख 

चिड़िया जो फुदका करती थी इधर उधर
उसको भी लगता है मौसम गया खटक 

आँगन के पीछे एक पेड़ बड़ा सा है
सर सर करता था, देता था शीतल छांव

साथ छोड़ कर भाग रहे हैं पत्ते अब
लगता है पत्तों के भी निकले हैं पाँव

बहुत बुलाया, खेतों ने आवाजें दी 
सुनकर सारे बीज कोपलें जाग गयी 

दो बूंदे आंसू जैसी टपकाई और
बरखा रानी नखरे कर के भाग गयी

सूरज के तेवर कुछ ज्यादा चढ़े हुए
देर शाम तक दीखते हैं वो खड़े हुए

४ बजे जो भगा करते थे  घर को
सरकारी जन ऑफिस में हैं पड़े हुए

बरखा रानी बहुत हुआ अब बरसो न
तुम भी धरती से मिलने को तरसो न

तुमको पाकर सबकुछ होगा हरा भरा 
प्रेम बाँट कर अपना तुम भी हरसो न

Sunday, June 17, 2012


करवटें बेतरतीब सी



















करवटें बेतरतीब सी
न पलकों को बंद होने दे
न आँखों को खुलने  दें
न नींद को आवाज़ दें
न सपनो को घुलने दें

करवटें बेतरतीब सी
बिस्तर पर सिलवटों को बढाती 
रात की ख़ामोशी को चिढाती
न जाने कैसे भूले बिसरे किस्से सुनाती
हर आहट पर बेचैन कर जाती

करवटें बेतरतीब सी
आज मौका दे रही हैं छत की और निहारने का
कोई पुराना सा गीत गाने का
घडी की टिक  टिक  के साथ ताल मिलाने का
और वो सबकुछ सोचने का जो थकान भरी नींद अक्सर सोचने नहीं देती

करवटें बेतरतीब सी
आज कह रही है
निकल चलो एसी कमरे से बाहर
खुले आसमान के नीचे चांदनी तले बैठते हैं
अपनी परछाइयों से बातें करते हैं
और सोचते हैं की जिंदगी में बहुत कुछ है
कमाने, खाने और जिंदा रहने की चाह के अलावा

Friday, May 18, 2012


तेरी यादों के जंगल में
कभी सोये, कभी खोये

कभी खुल के हँसे हम
और कभी छुप छुप के हम रोये

कभी कागज़ की कश्ती पर
सफ़र कर आ गए वापस

कभी हंस कर उदासी के
सभी नमो निशान धोये 

Friday, May 4, 2012

वक़्त

चीनी में चाय की तरह
लम्हा लम्हा घुलता वक़्त
कंधे पर उठाये
न जाने कितनी यादों का बोझ
चलता रहता है लगातार
और छांटता बीनता रहता है
अच्छे बुरे लम्हों को
कभी करता है कुछ बोझ हल्का
तो कभी बटोर लेता है
कुछ और नर्म मीठी यादें अपने झोले में
और यूँ ही चलते फिरते एक दिन
गुज़र जाता है वक़्त
फिर पलट कर
वापस न आने के लिए

Sunday, April 15, 2012

हवा के परों पर
है मेरी धरोहर
कहाँ कब तलक है
ये कैसे बताऊँ

हर एक रास्ता
मुझको अपना लगे है
किसे मोड़ समझू
मै किस राह जाऊं

भरे है खजाने
कई चाहतों के
मै सबको बता दूँ
या सबसे छुपाऊँ

जो यादें पलट कर
दिखाती है चेहरा
उन्हें याद रखूं
या फिर भूल जाऊं

मुझे देखकर
उनकी पलकें हुई नम
उन्हें चूम लूँ
या गले से लगाऊं

मुझे जिंदगी ने
सिखाया बहुत कुछ
है अब वक़्त आया
उन्हें आजमाऊं