कभी दिल के दरख्तों पर उगे काँटों को देखा है?
कभी बिन चाँद तारों की सियाह रातों को देखा है
कभी देखा है आंसू किस कदर खामोश होते है?
कभी दिल में छुपे मासूम जज्बातों को देखा है?
कभी देखा है कैसे जिंदगी दमन छुडाती है...
कभी बरसे बिना जाते हुए सावन को देखा है?
कभी देखा है उसके पैर में छाले पड़े है क्यों...
कभी सर्दी में खस्ताहाल बेचारों को देखा है?
कभी रोते हुए चेहरों को दो पल की हँसी दी है...
कभी गैरों के ज़ख्मों पर मरहम लगा कर देखा है?
Thursday, October 8, 2009
Wednesday, October 7, 2009
Wednesday, September 23, 2009
Tuesday, September 1, 2009
जिंदगी
बैठी अकेली सोचती हूँ जिंदगी क्या चीज़ है…
मन में दबी सी चाहतों की अनमनी सी खीज है,
सपने बहुत, चाहत बहुत, पर कौन पूरी कर सका
है ख्वाब सबके एक से, पर सबने सबसे है ढका।
क्यों सोचते इतना है हम दुनिया कहेगी क्या भला...
है जख्म मेरे जिस्म के तो दर्द भी मैंने सहा।
आओ करे कुछ ख्वाब पूरे छोड़ कर दुनिया के गम....
बस आज हे है जिंदगी, कल जाने हो या न हो हम.
मन में दबी सी चाहतों की अनमनी सी खीज है,
सपने बहुत, चाहत बहुत, पर कौन पूरी कर सका
है ख्वाब सबके एक से, पर सबने सबसे है ढका।
क्यों सोचते इतना है हम दुनिया कहेगी क्या भला...
है जख्म मेरे जिस्म के तो दर्द भी मैंने सहा।
आओ करे कुछ ख्वाब पूरे छोड़ कर दुनिया के गम....
बस आज हे है जिंदगी, कल जाने हो या न हो हम.
हर लम्हा घुलता जाता है
हर लम्हा घुलता जाता है...
कच्चे रंग की दीवारों सा बारिश में घुलता जाता है।
हर लम्हा उड़ता जाता है...
आवारा क़दमों के जैसा अनजान गली मुड़ जाता है।
हर लम्हा कुछ कुछ कहता है...
कोशिश रुकने की करता है फिर भी ये बहता रहता है।
हर लम्हा ख्वाब सजाता है...
कुछ पूरे भी हो जाते हैं, कुछ आधा सा रह जाता है।
हर लम्हा अंजाना सा है...
पल में पहचान बढाता है, आता है और खो जाता है।
हर लम्हे को जी कर देखा...
और जाना इसका जाना है, क्यों अपना इसको माना है।
जी लो जी भरकर अभी इसे...
ये वापस फिर न आना है, खोने से पहले पाना है.
Friday, August 14, 2009
जन्नत
बहुत खुशकिस्मत है वो धूप ,
जो चूमती है मेरे घर के आँगन को …
बहुत खुशकिस्मत है वो हवा ,
जो फूँक मरकर उडाती है मेरे घर के परदों को …
बहुत खुशकिस्मत है वो बारिश ,
जो भिगोती है मेरे घर के फर्श , दीवारों और पेडों को …
क्योंकि ज़मीन पर जन्नत को चूने का मौका ,
हर किसी को नही मिलता .
जो चूमती है मेरे घर के आँगन को …
बहुत खुशकिस्मत है वो हवा ,
जो फूँक मरकर उडाती है मेरे घर के परदों को …
बहुत खुशकिस्मत है वो बारिश ,
जो भिगोती है मेरे घर के फर्श , दीवारों और पेडों को …
क्योंकि ज़मीन पर जन्नत को चूने का मौका ,
हर किसी को नही मिलता .
कभी खुल कर जिंदगी से हाथ मिलाना
कभी खुल कर जिंदगी से हाथ मिलाना
वो जैसी है उसे वैसे ही अपनाना
मत टटोलना उसके अन्दर की छुपी बुराइयों को
उसके बेसुरेपन को सुर में गुनगुनाना
उसकी कड़वाहट में कुछ मिठास घोलना
उसकी बाँहों को थाम आहिस्ता से डोलना
उसकी आँखों में आँखे डालकर उसे समझना
जब भी बोलना कुछ अपना सा बोलना
देखना धीरे धीरे जिंदगी सुर में गुनगुनायेगी
हर बिगड़ी हुई बात अपनेआप बन जायेगी
तुम सोचते रह जाओगे ये हुआ कैसे??
और वो कोने में खड़ी तुम्हे देख कर मुस्कुराएगी
वो जैसी है उसे वैसे ही अपनाना
मत टटोलना उसके अन्दर की छुपी बुराइयों को
उसके बेसुरेपन को सुर में गुनगुनाना
उसकी कड़वाहट में कुछ मिठास घोलना
उसकी बाँहों को थाम आहिस्ता से डोलना
उसकी आँखों में आँखे डालकर उसे समझना
जब भी बोलना कुछ अपना सा बोलना
देखना धीरे धीरे जिंदगी सुर में गुनगुनायेगी
हर बिगड़ी हुई बात अपनेआप बन जायेगी
तुम सोचते रह जाओगे ये हुआ कैसे??
और वो कोने में खड़ी तुम्हे देख कर मुस्कुराएगी
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