Friday, December 4, 2009

क्यूँ दर्द में यूँ डूबने लगता है दिल ?
क्यूँ जिंदगी से ऊबने लगता है दिल ?
क्यूँ झूठी मुस्कुराह्ते जुटाने में...
सच्चाइयों से जूझने लगता है दिल ?

Thursday, December 3, 2009

नींद कही सोयी है छुप कर...

नींद कही सोयी है छुप कर...
और मै अबतक जाग रही हूँ,
क्या है बेचैनी का कारण...
और मै किससे भाग रही हूँ.

काम बहुत से करने है पर...
मन न जाने कहा टंगा है,
सोच सोच कर थकी हुई हूँ...
किस रंग में ये आज रंगा है.

चुपके से मै लेम्प जलाकर...
लिखे जा रही मन की बातें,
सब जग सोया बस मै जागूं...
कैसी सन्नाटी सी रातें.

सोच रही हूँ कबतक जागूं..
अब सोने की कोशिश कर लूँ,
बिटिया सोयी बड़े चैन से...
अब उसको बाँहों में भर लूँ.

Saturday, November 14, 2009

गुमशुदा सी ज़िन्दगी में तयशुदा कुछ भी नहीं,
कुछ नहीं खुद का मगर खुद से जुदा कुछ भी नहीं,
देख कर गैरों के गम जब दर्द से दिल रो उठे...
बस यही तो है खुदाई और खुदा कुछ भी नहीं .
मरने की ख्वाहिशों में जीने लगे है हम…
जख्मों को चुपके चुपके सीने लगे है हम…
जब थक गए हम खुद के अश्कों को पोछकर…
गैरों के अश्क अब तो पीने लगे है हम.

Tuesday, November 10, 2009

तुम्हारे क़दमों की आहट
तलाशती फिर रही हूँ
बदल चुके मौसम में भी...
तलाश रही हूँ तुम्हारी खुशबु को।

की शायद ओस की किसी बूँद में
रेत पर ओंधे मुह पड़ी हुई पत्तियों के नीचे
वोगंवेलिया के उस झुरमुट के पीछे
या फिर ठण्ड से बचने की कोशिश में...
जलाई गयी टहनियों की उस गुनगुनी राख में

बची रह गयी हो तुम्हारी कोई चाह
कोई आह...
कोई एहसास
कोई आहट
कुछ तो हो...
जो तुम्हारे यहाँ होने का एहसास दिला जाए
और मै उस एहसास के सहारे
फिर से जी लूँ कुछ पल तुम्हारे साथ
क्योंकि तुम्हारे न होने पर भी
जीती तो हूँ तुम्हे
शायद उनसे ज्यादा जो है आसपास.

Thursday, October 8, 2009

कभी देखा है

कभी दिल के दरख्तों पर उगे काँटों को देखा है?
कभी बिन चाँद तारों की सियाह रातों को देखा है
कभी देखा है आंसू किस कदर खामोश होते है?
कभी दिल में छुपे मासूम जज्बातों को देखा है?
कभी देखा है कैसे जिंदगी दमन छुडाती है...
कभी बरसे बिना जाते हुए सावन को देखा है?
कभी देखा है उसके पैर में छाले पड़े है क्यों...
कभी सर्दी में खस्ताहाल बेचारों को देखा है?
कभी रोते हुए चेहरों को दो पल की हँसी दी है...
कभी गैरों के ज़ख्मों पर मरहम लगा कर देखा है?

Wednesday, October 7, 2009

तुम जब दिलो को तोड़ने की बात करते हो...
समझो खुदा को छोड़ने की बात करते हो...
ये वो लहर जिसका नही मुमकिन है रुक पाना...
तुम क्यों समुन्दर मोड़ने की बात करते हो?