Thursday, March 24, 2011



क्या पाया, क्या पाकर खोया
क्या काटा और क्या क्या बोया


किस्मत के धोबी ने हमको
हर पत्थर पर जमकर धोया


गर्दन करके कलम मेरी

वो बोले ये क्यों कम है रोया


मेरा सपना डर के मारे
रातों को भी रहता सोया

हमने बड़ी ख़ुशी से
हर एक बोझ जिंदगी का है ढोया


ग़ालिब होते तो कहते
मेरा गम भी कोई गम था मोया

Saturday, March 19, 2011



जिंदगी की चादरों पर
रंग गाढ़े, रंग हलके

कुछ छलक कर खो चुके हैं
कुछ छलकने को हैं ढलके

कुछ बिखर कर बह चुके हैं
कुछ फिजाओं में है महके

कुछ बड़े नाज़ुक नरम
और कुछ गरम शोलों से दहके

Tuesday, March 15, 2011



जो बरस कर थम चुका है
वो कही पर जम चुका है
सुर्ख गाढ़े से लहू सा
धमनियों में रम चुका है

दर्द देकर दूसरों को
कब किसी का गम चुका है
प्यार की मीठी नज़र पर
आसमान का सर झुका है

सूनी सी टहनी पर फिर से
फूल कोई खिल चुका है
चुप हैं वो बरसों से जैसे
होंठ कोई सिल चुका है

आसमान का चाँद तो
अपनी पहुँच में था नहीं
लहरों पर उसका चमकता
अक्स हमको मिल चुका है

Saturday, February 19, 2011

आंगन फिर से हरा है





देख रही हूँ
एक सूखा पौधा फिर से हरा होता
उसकी मिट्टी में फिर से सुगंध है
फूट रही हैं कोपलें
और वो सख्त टहनियां
जो छूते ही चुभ जाती थी
अब नरम होती जा रहीं है
पहले मै बचा कर निकलती थी
इससे अपना आंचल
अब पोंछ देती हूँ अपने आंचल से
इसकी कोपलों पर जमी धूळ
मन है प्रसन्न क्योंकि
बहुत दिनों बाद
आंगन फिर से हरा है
खुशियों से भरा है

Tuesday, February 15, 2011

खोजते हो क्यों मुझे





खोजते हो क्यों मुझे
बनकर हवा मै बह गयी
हर्फ़ जो किस्मत में थे
तुमसे सभी वो कह गयी

चांदनी अब भी है रोशन
रात है अब भी जवां
फिर तुम्हे लगता है क्यों
की कुछ कमी सी रह गयी

रिश्तों की दीवार में
शायद नमी ज्यादा ही थी
हल्का सा झोंका जो आया
भरभरा कर ढह गयी

वक़्त कर देता है दिल को सख्त
अब आया यकीन
कितने सारे हादसे
मै मुस्कुरा कर सह गयी

Wednesday, January 26, 2011



इन्क्रीमेंट से पहले

जबतक मिलता रहता है कर्म का फल
लगता है जीवन कितना है सफल

हर बोये हुए बीज का फल मिलेगा
जिसे सींचा है बड़ी लगन से वो फूल खिलेगा

हम चखेंगे मिठास, महसूस करेंगे सुगंध
महक उठेगा मन मकरंद



इंक्रीमेंट के बाद

जब आपकी मेहनत किसी और का बहीखाता सजाती है
जब उनतक गड्डियां और आपतक कोड़ियां आती हैं

जब आपके लिए सिर्फ काम और उनके लिए सिर्फ दाम होते है
आपकी सांसे हराम, और उनके लिए सिर्फ आराम होते हैं

तो हर पल आता है एक नया ख्याल
बजा दो तमांचो से सामने वाले का गाल

फंसा दो काम ऐसे की न घर रहे न घाट
लगा दो उसकी जमकर वाट

मना कर दो हर काम, करके बहाना
याद दिला दो उसकी नानी और नाना

उसके बालों से बांध कर उसे पंखे पर दो टांग
छोड़ आओ चौराहे पर पिलाकर भांग

फिर छोड़ दो पागल कुत्ते उसके पीछे
कोई कुत्ता आगे, कोई पीछे से खींचे

तब शायद आये थोड़ी सी राहत
बस इतनी ज़रा सी है मेरी चाहत


ये कविता केवल मन की भड़ास निकलने के लिए लिखी गयी है.
इसलिए इसको पढ़े, मुस्कुराएँ और भूल जाएँ.

Thursday, January 6, 2011

ढूंढ रही हूँ शब्द सुनहरे



ढूंढ रही हूँ शब्द सुनहरे
रंगने को कुछ कवितायेँ
सभी शब्द कच्चे रंगों से
कोई मन को न भाये

लिखा बहुत कुछ सब बेमानी
बिना प्राण के तन जैसा
ऋतू बसंत आने से पहले
पतझड़, निर्जन वन जैसा

मन के घाव बहे न जबतक
नैनों के गलियारे से
गालों से होकर होठों को
कर जाएँ जब खारे से

तब उगती है कोई कविता
तब बनता है कोई गीत
सदियों से सच्चे लेखन की
एक यही एकलौती रीत