दर्द देखा जब तुम्हारा गर्द सा सबकुछ लगा
गुनगुनी सी शाम में भी सर्द सा सबकुछ लगा
Friday, September 17, 2010
Monday, September 13, 2010
मसरूफियत
Sunday, August 29, 2010
आओ....थाम लें फिर से हथेलिया

आओ....
थाम लें फिर से हथेलिया
सारे दोस्त, सारी सहेलियां
लौट पड़े बचपन की और
भूल कर आज की पहेलियाँ
मिट्टी में बनायें कुछ घरौदे
खेले सिकड़ी और छुपा छुपाई
वो खट्टे मीठे चूरन
वो धूप में पड़ी चारपाई
वो मोर्निंग वाक पर जाने के लिए
गेट से कूद कर दोस्त को जगाना
झूठे भूत के किस्से सुना कर
रोब जमाना, सबको डरना
वानर सेना बनाकर
पूरी कालोनी में चक्कर लगाना
दीदी को साईकिल सिखाने में
खुद भी गिरना, उनको भी गिरना
यादें वैसी ही है ताज़ा
जैसी सुबह की ओस
पर बदल गए है वो एहसास
वो जज्बा, वो जोश
अब मन की तस्वीर
स्वार्थ से लेमिनेटेड है
बिना काम के किसी से मिलना
फैशन आउट डेटेड है
थाम लें फिर से हथेलिया
सारे दोस्त, सारी सहेलियां
लौट पड़े बचपन की और
भूल कर आज की पहेलियाँ
मिट्टी में बनायें कुछ घरौदे
खेले सिकड़ी और छुपा छुपाई
वो खट्टे मीठे चूरन
वो धूप में पड़ी चारपाई
वो मोर्निंग वाक पर जाने के लिए
गेट से कूद कर दोस्त को जगाना
झूठे भूत के किस्से सुना कर
रोब जमाना, सबको डरना
वानर सेना बनाकर
पूरी कालोनी में चक्कर लगाना
दीदी को साईकिल सिखाने में
खुद भी गिरना, उनको भी गिरना
यादें वैसी ही है ताज़ा
जैसी सुबह की ओस
पर बदल गए है वो एहसास
वो जज्बा, वो जोश
अब मन की तस्वीर
स्वार्थ से लेमिनेटेड है
बिना काम के किसी से मिलना
फैशन आउट डेटेड है
Monday, August 23, 2010
बहुएं
Tuesday, August 17, 2010
सरहदों की हदें तय तो कर दी मगर,

सरहदों की हदें तय तो कर दी मगर,
हसरतों की हदों पर न कब्ज़ा हुआ....
कब ज़मीन पूछती है कहाँ से हो तुम?
जब किसी बूँद ने उसके तन को छुआ।
क्या कभी धूप को खुरदुरे फर्श पर...
कोई पौधा सवालों का बोते सुना?
क्या कभी ओस ने पूछ मज़हब शहर,
वादियों के किसी ख़ास गुल को चुना?
क्या कभी चाँद तारों ने अपनी चमक
बांटते वक़्त सोचा यहाँ या वहां?
फिर क्यों हम बांटते? फिर क्यों हम काटते?
लेके जाएगी ये सोच हमको कहाँ?
Friday, August 13, 2010
जिंदगी तू मुस्कुराये बस यही एक चाह थी
Saturday, August 7, 2010
अब नयी एक इमारत बनायेगे हम

क्यों सहूँ , क्यों रहूँ दर्दो गम के तले
क्यों रहे यूँ नमी मेरी पलकों तले
क्यों मै सिलती रहू चिंदिया हर घडी
जब पता है, है रिश्ते के धागे गले
क्यों देखू मै ख्वाबों का बिखरा लहू
क्यों डरूं जब कोई चाह दिल में पले
क्यों चुभे मुझको रोशन सा दिन आजकल
क्यों मिलती है राहत अंधेरों तले
क्यों पुकारूँ वही नाम हर हाल में
जिनके कानो में रुई के फाहे पड़े
अब नयी एक इमारत बनायेगे हम
हम क्यों खोदे पुराने वो मुर्दे गड़े
(घरेलू हिंसा की त्रासदी सहती हुई हर नारी को समर्पित)
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