Tuesday, December 8, 2009

लम्हे

लम्हों को समेटना आसान नहीं...
चलते फिरते , सोते जागते समेटती रहती हूँ इन्हें
लेकिन बिखर ही जाते हैं.

कभी तकिये के सिरहाने छिपाती हूँ इन्हें,
कभी बांध लेती हूँ दुपट्टे के पल्लू में,
कभी छिपाती हूँ मन के कोने में...
तो कभी यूँ ही बिखेर देती हूँ ये सोचकर,
की फिर से समेट लूंगी इन्हें कुछ और नए लम्हों के साथ.

कुछ लम्हे बहुत हसीन है,
गुदगुदा जाते है मन को.
कुछ दर्द देते है चुभ से जाते है,
कुछ लम्हे हँसाते हैं,
और कुछ आँखों से फिसल कर...
गालों को नम कर जाते है.

तुम भी समेटना इन लम्हों को,
बड़े प्यार से, करीने से सजाना इन्हें,
क्योंकि जिंदगी के उन पलों में जब कोई साथ नहीं होता
ये लम्हे बहुत काम आते है.

तुम्हारे सर को अपने कन्धों पर रखकर
प्यार से सहलातें है,
ये एहसास करते है...
की तुम दुनिया में अकेले नहीं.

कभी बुलाकर देखना इन्हें...
ये समय की परवाह किये बगैर,
दौड़ते हुए आयेंगे.

तुम्हारी बाँहों को थाम कर,
तुम्हारे दिल का हाल सुनेगे,
कुछ अपनी भी सुनाएँगे.

और मुस्कुरा कर कहेंगे
Don’t worry be happy यार
मै हमेशा तुम्हारे साथ हूँ...
हर पल एक नए लम्हे के साथ.

Sunday, December 6, 2009

कविता

फिर चिटका मन और बह निकली कविता…
भरमाई, भोली सी, भीगी कविता,

सुख में साथ नहीं थी दूर खड़ी थी…
दुःख आया तो संग संग आई कविता,

नैनों में भर आये हर आंसू को…
सीपी में मोती सा रखती कविता,

भावों का करके सिंगार मनोहर…
पन्नों के घूँघट से ढकती कविता,

साथ नहीं जब संगी साथी कोई…
साथ निभाती, हाथ बढ़ाती कविता,

चुप सी काली रातों में भी जागी...
मुझे सुलाने की प्रयास में कविता,

जीवन के सारे भारी पल लेकर,
मन का सारा बोझ मिटाती कविता...

साथ बहुत से छूटे धीरे धीरे
साथ निभाती अंत समय तक कविता.

Friday, December 4, 2009

क्यूँ दर्द में यूँ डूबने लगता है दिल ?
क्यूँ जिंदगी से ऊबने लगता है दिल ?
क्यूँ झूठी मुस्कुराह्ते जुटाने में...
सच्चाइयों से जूझने लगता है दिल ?

Thursday, December 3, 2009

नींद कही सोयी है छुप कर...

नींद कही सोयी है छुप कर...
और मै अबतक जाग रही हूँ,
क्या है बेचैनी का कारण...
और मै किससे भाग रही हूँ.

काम बहुत से करने है पर...
मन न जाने कहा टंगा है,
सोच सोच कर थकी हुई हूँ...
किस रंग में ये आज रंगा है.

चुपके से मै लेम्प जलाकर...
लिखे जा रही मन की बातें,
सब जग सोया बस मै जागूं...
कैसी सन्नाटी सी रातें.

सोच रही हूँ कबतक जागूं..
अब सोने की कोशिश कर लूँ,
बिटिया सोयी बड़े चैन से...
अब उसको बाँहों में भर लूँ.

Saturday, November 14, 2009

गुमशुदा सी ज़िन्दगी में तयशुदा कुछ भी नहीं,
कुछ नहीं खुद का मगर खुद से जुदा कुछ भी नहीं,
देख कर गैरों के गम जब दर्द से दिल रो उठे...
बस यही तो है खुदाई और खुदा कुछ भी नहीं .
मरने की ख्वाहिशों में जीने लगे है हम…
जख्मों को चुपके चुपके सीने लगे है हम…
जब थक गए हम खुद के अश्कों को पोछकर…
गैरों के अश्क अब तो पीने लगे है हम.

Tuesday, November 10, 2009

तुम्हारे क़दमों की आहट
तलाशती फिर रही हूँ
बदल चुके मौसम में भी...
तलाश रही हूँ तुम्हारी खुशबु को।

की शायद ओस की किसी बूँद में
रेत पर ओंधे मुह पड़ी हुई पत्तियों के नीचे
वोगंवेलिया के उस झुरमुट के पीछे
या फिर ठण्ड से बचने की कोशिश में...
जलाई गयी टहनियों की उस गुनगुनी राख में

बची रह गयी हो तुम्हारी कोई चाह
कोई आह...
कोई एहसास
कोई आहट
कुछ तो हो...
जो तुम्हारे यहाँ होने का एहसास दिला जाए
और मै उस एहसास के सहारे
फिर से जी लूँ कुछ पल तुम्हारे साथ
क्योंकि तुम्हारे न होने पर भी
जीती तो हूँ तुम्हे
शायद उनसे ज्यादा जो है आसपास.