Saturday, October 18, 2014

'माँ जल्दी घर आओ न'



'माँ जल्दी घर आओ न'

जब तुम मुस्कुराती हो
और चमकती है तुम्हारी जुगनू सी आंखे
मै बन जाती हूँ दुनिया की सबसे खुशनसीब औरत

निकल आते है पंख मेरे कंधो पर
तुम्हे बैठा कर अपनी पीठ पर
मै घुमा लाती हूँ सात समुन्दर पार

मेरे घर पहुचते ही दौड़ पड़ती हो तुम मेरी ओर
और मै कहती हूँ रुको बेटी मुझे मुंह तो धोने दो
और तुम चल पड़ती हो मन्त्र मुग्ध सी मेरे पीछे

ऑफिस में जब रुकना पड़ता है
देर तक किसी मीटिंग के कारण
पांच बजे के बाद मुझे दीखता है
सिर्फ घर, तुम और तुम्हारे पापा
सुनाई देती है सिर्फ एक आवाज़
'माँ जल्दी घर आओ न'

जो गुज़रे साल जलाये थे पटाखे तुमने

उसमे कुछ शोर था, कुछ रौशनी धमाकों की

चलो इस बार बाँट आये ज़रा सी खुशियां


किसी गरीब को नौबत न आये फांको की


- रंजना डीन

Tuesday, September 30, 2014

आज फिर एक साँस टूटी
फिर उगा तारा कोई
ज़िंदगी पायी किसी ने
मौत से हारा कोई।
था बड़े मीठे से दिल का
अश्क़ अब खारा कोई
फिर रहा है आसमान में
बन के आवारा कोई
हम तो अपने अश्क़
कागज़ पर बहा लेते हैं पर
छुप के तनहा रो रहा है
दर्द का मारा कोई
- रंजना डीन

Thursday, September 18, 2014

ज़िंदगी के साथ रिश्ता यूँ निभाना चाहिए 
करके दिल का बोझ हल्का मुस्कुराना चाहिए 

रूठ जाने पर निकल जाना अकेले दूर तक 
रात गहराने से पहले लौट आना चाहिए 

गैर मुमकिन है की हर झोकें में हो ठंडी हवा 
खुश्क से पत्तों के संग कुछ धूल आना चाहिए 

हर किसी के साथ हैं दुश्वारियों के सिलसिले 
हल न हो पाएं जो मसले, भूल जाना चाहिए 

- रंजना डीन 

Wednesday, September 17, 2014

उन्हें हम छोड़ आये हैं समुन्दर के किनारे 

जिन्हे देखा था शामिल कश्तियाँ डुबोने में

बारिशें ज़ोर की आने को हैं, वो तनहा हैं

कश्ती कागज़ की हम भी बांध आये कोने में


- रंजना डीन

Wednesday, August 27, 2014

डूब जाने का खतरा है, फिसल जाने का डर है

बड़ा जोखिम भरा ये इश्क़ का नाज़ुक सफर है


जो डूबे साथ तो जाँ बच भी सकती है लेकिन


जो तन्हा रह गए तो जान के जाने का डर है



- रंजना डीन