Sunday, March 16, 2014

कभी सुनना मेरी ख़ामोशी को गौर से
कभी पढ़ना वो शब्द जो मैं लिखती नहीं
तो जान जाओगे खुद-ब-खुद
समुन्दर इतना गहरा और खारा क्यों हैं
- रंजना डीन

Monday, February 17, 2014

ज़िंदा हूँ मैं 

तुम्हे पता है मैं हूँ परिंदा 
कुछ मायूस मगर ज़िंदा
और मुझे पता है तुम्हे पसंद नहीं मेरी उड़ान 
इसलिए समेट लिए हैं मैंने अपने पँख 
और फुदकती रहती हूँ घर के आँगन में 
देखती रहती हूँ आसमान के परिंदों कि उड़ान 
उनका आना - उनका जाना 
उनका दरख्तों पर बैठ पंख फड़फड़ाना, चहचहाना 
कभी कभी हो जाती हूँ उदास 
ज़िंदगी नहीं आती रास 
फिर रोपने लगती हूँ 
घर के आँगन में कुछ खुशियों के पौधे 
कि उनकी देखभाल में शायद 
कुछ पल को हट जाये नज़र आसमान से 
भूल जाऊँ अपने परिंदे होने के एहसास को 
पर आसमान से लहराकर गिरता है  
जब कोई पंख मेरी हथेली पर 
फिर से याद आ जाता है 
ज़िंदा हूँ मैं 
परिंदा हूँ मैं 

- रंजना डीन 

Monday, December 9, 2013

मुझे पता है टूटे हुए पत्ते 
फिर से नहीं जुड़ेंगे अपनी टहनियों से 
लेकिन उनको इकट्ठा करके बनायीं गयी खाद 
दे जाती है मजबूती उसकी जड़ों को 
ठीक उसी तरह जैसे बुज़ुर्ग साथ हो या न हो 
मगर उनकी दुआएं
ज़िंदगी के हर कमज़ोर वक़्त में 
हाथ थाम कर खड़ी हो जाती हैं 
हमारा साथ देने के लिए 


Monday, December 2, 2013

सन्डे इज़ फन डे??

बड़े दिन बाद 
आज घर कि दोपहर देखी 
देखा किस समय धूप 
कौन सी दीवार पर पसरती है 
कबतक रहती है उसमे नरमी
और कब चुभने लगती है गर्मी 
निम्बू का अचार भी बनाया आज 
जीरे और काली मिर्च वाला 
कांच के मरतबान से झांकते 
रस में डूबे पीले निम्बू 
यूँ लग रहा है जैसे सारे स्माइली 
आकर जगह इकट्ठा हो गये हैं 
सन बाथ लेने के लिए 
दही मथी, मक्खन निकाला 
देसी घी भी बनाया 
और बनायीं राशन की फहरिस्त 
की कोने कोने कि सफाई 
रज़ाई को धूप दिखायी 
और पूरी कि स्पेशल खाने कि फरमाइश 
कौन कम्बख्त कहता है सन्डे इज़ फन डे 
सम टाइम्स इट्स मोर हैक्टिक देन मंडे 

लेकिन फिर भी लविंग इट....;)…:) 

- रंजना डीन

Friday, November 29, 2013

खुशियों कि खुशफहमी रखना
घर में गहमागहमी रखना
पूरा सच कड़वा होता है
थोड़ी सी गलत फहमी रखना
- रंजना डीन 

Thursday, October 3, 2013

घर 

संग-ए-मरमर फर्श पर है 
मखमली दीवारों दर 
है मकां ये खूबसूरत 
पर नहीं लगता ये घर 

न चहकते हैं परिंदे 
न यहाँ बच्चों का शोर 
छत से गुजरी जब पतंगे 
न किसी खींची डोर

न कभी आया कोई ख़त
न ठहाकों की फिज़ा
दर्द बोया था कभी
अब उसके साये की सज़ा

नीव हो बस प्यार की
और दिल में न हो कोई डर
छोटे छोटे लम्हे बुनकर
बनता है कोई भी घर

- रंजना डीन

Sunday, September 15, 2013

मै अकेली कब थी 
तुम गए तो तन्हाई आ गयी
चहकती रही मेरे साथ 
बतियाती रही रात भर 
कभी इस करवट लेट जाती
कभी उस करवट 
कभी जोर से कहकहे लगाती  
कभी आह भर कर चुप हो जाती 
कभी गुनगुनाती कोई पुराना सा गीत
कभी याद दिलाती पुरानी बातें 
की सर्दियों में माँ स्वेटर की जेब में 
ढेर सारी मूंगफली भर देती थी 
और हम उसे खाते हुए
निकल जाते थे दूर तक बतियाते हुए 
सुबह झुण्ड बनाकर साईकिल से 
मोर्निंग वाक पर जाना भी याद है 
वो नीरजा भी याद है 
जो मुझे जगाने आती थी 
और मेरी नींद खुलने के इंतज़ार में 
अक्सर वो भी मेरे साथ सोती रह जाती थी
मुझे याद है तरबूज काटने से पहले 
उसपर मै चेहरा बना दिया करती थी 
चाकू से कुरेद कर 
एक दिन पापा ने टोका था 
बेटा ऐसा मत किया करो 
लगता है किसी की बलि दे रही हो 
ऐसे ही न जाने कितने पल 
सुनते सुनाते रहे हम रात भर 
और लो सुबह हो गयी 
तनहाई भी उबासियाँ ले रही है 
और कह रही है 
यार रात कैसे कट गयी 
पता ही नहीं चला?

- रंजना डीन