Friday, November 29, 2013

खुशियों कि खुशफहमी रखना
घर में गहमागहमी रखना
पूरा सच कड़वा होता है
थोड़ी सी गलत फहमी रखना
- रंजना डीन 

Thursday, October 3, 2013

घर 

संग-ए-मरमर फर्श पर है 
मखमली दीवारों दर 
है मकां ये खूबसूरत 
पर नहीं लगता ये घर 

न चहकते हैं परिंदे 
न यहाँ बच्चों का शोर 
छत से गुजरी जब पतंगे 
न किसी खींची डोर

न कभी आया कोई ख़त
न ठहाकों की फिज़ा
दर्द बोया था कभी
अब उसके साये की सज़ा

नीव हो बस प्यार की
और दिल में न हो कोई डर
छोटे छोटे लम्हे बुनकर
बनता है कोई भी घर

- रंजना डीन

Sunday, September 15, 2013

मै अकेली कब थी 
तुम गए तो तन्हाई आ गयी
चहकती रही मेरे साथ 
बतियाती रही रात भर 
कभी इस करवट लेट जाती
कभी उस करवट 
कभी जोर से कहकहे लगाती  
कभी आह भर कर चुप हो जाती 
कभी गुनगुनाती कोई पुराना सा गीत
कभी याद दिलाती पुरानी बातें 
की सर्दियों में माँ स्वेटर की जेब में 
ढेर सारी मूंगफली भर देती थी 
और हम उसे खाते हुए
निकल जाते थे दूर तक बतियाते हुए 
सुबह झुण्ड बनाकर साईकिल से 
मोर्निंग वाक पर जाना भी याद है 
वो नीरजा भी याद है 
जो मुझे जगाने आती थी 
और मेरी नींद खुलने के इंतज़ार में 
अक्सर वो भी मेरे साथ सोती रह जाती थी
मुझे याद है तरबूज काटने से पहले 
उसपर मै चेहरा बना दिया करती थी 
चाकू से कुरेद कर 
एक दिन पापा ने टोका था 
बेटा ऐसा मत किया करो 
लगता है किसी की बलि दे रही हो 
ऐसे ही न जाने कितने पल 
सुनते सुनाते रहे हम रात भर 
और लो सुबह हो गयी 
तनहाई भी उबासियाँ ले रही है 
और कह रही है 
यार रात कैसे कट गयी 
पता ही नहीं चला?

- रंजना डीन 

Tuesday, June 25, 2013

 रिसती दीवार 

सीलन से यूँ ही नहीं गिर जाती दीवारें 
बहुत दिनों तक खुद में ही
समेटती, सहेजती रहती है नमी को 
संभालती रहती हैं हर कमी को 
पर जब ये नमी उभर आती है 
बूँदें बन कर सीली हुई दीवारों पर 
फिसलती हैं लकीर बनकर किनारों पर 
तब हमदर्दी की धूप की गर्मी 
मीठे से लफ़्ज़ों की नरमी 
अगर सुखा ले गयी ये सीलन 
तो फिर जी उठता है सहने का जज्बा
वर्ना किसी दिन यूँ ही
घावों सी रिसती दीवार
दम तोड़कर ढह जाती है

- रंजना डीन

ख़ुशी हो साथ, या न हो
मगर गम ढून्ढ लेता है

मै कितना भी छुपुं
मेरी महक ये सूंघ लेता है

चला आता है चुपके से
रुला जाता है जी भर के

मेरे कंधे पे सर रखकर
ये घंटो ऊंघ लेता है

- रंजना डीन

Sunday, June 16, 2013

Happy Father's Day Dear Papa

पापा को याद करते हुए बचपन की एक याद शेयर कर रही हूँ आप सबसे...

बचपन में मैंने खेले खेल खिलौने ढेर
हाथी, बन्दर, भालू, मुर्गा, कछुआ और बटेर

पापा ने घुटनों पर अपने झुला बहुत झुलाया
कंधे पर बैठा कर मुझको सारा जहाँ घुमाया

थे पापा के पेट पर बहुत घनेरे बाल
जब भी देखू आता था जंगल का ख्याल

एक दिन पापा ऑफिस से थक कर जब घर आये
लेट गए वो बिस्तर पर थोड़ा सा सुस्ताये

बस क्या था मौका मिला करने को शैतानी
सैर करेंगे जंगल की आज जानवर ठानी

हाथी, बन्दर, भालू, कछुआ और पापा का पेट
सभी जानवर सजा दिए जरा किया न वेट

आख खुली तो पापा ने देखा और मुस्काए
बोले इतने जानवर जंगल से कब आये?

अब तो मैंने बना लिया इसे रोज़ का खेल
पापा मेरी कैदी थे मिल न पाती बेल

तंग आकर फिर पापा ने अपनी अकल लगायी
सजे जानवर पेट पर तो जोर से तोंद फुलाई

लुढ़क गए सब जानवर ऐसा लगा उछाल
पापा बोले जंगल में आया आज भूचाल

- रंजना डीन

Thursday, June 13, 2013


जिंदगी का पलंग

जिंदगी का पलंग
इतना है तंग
की लेते ही करवट
लुढ़क जाती हूँ

ठंडी ज़मीन
जब रास नहीं आती
तो खुद को समेट
कर सिमट जाती हूँ

देखती हूँ
पलंग के नीचे
तो कुछ खोयी हुई पुरानी चीज़ें
पड़ी पाती हूँ

मेरे जूड़े की स्टिक
कुछ रंग बिरंगी बिंदिया
कुछ टुडे मुड़े ख्वाब
बटोर लती हूँ

और फिर से
जिंदगी के पलंग पर लेट
कुछ गुनगुनाती हूँ
कुछ ख्वाब सजाती हूँ 

 - रंजना डीन