कडकती ठण्ड में...
थरथराती सांसे लिए...
ठण्ड से बचने के लिए...
खुद को खुद में छुपाने की कोशिश करती हुई,
आना ही पड़ा ऑफिस।
काश कुछ छुट्टियाँ और मिल जाती...
और थोडा वक़्त और बिता लेती घर पर.
परिवार के साथ रजाई में बैठकर...
गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुए...
छुट्टियाँ बिताने से अच्छा क्या हो सकता है।
लेकिन हाय ये प्राइवेट नौकरी,
जान जाये पर काम न जाये।
आज एक सहकर्मी बोला...
कोई आज बहुत प्रशंशा कर रहा था हमारे विभाग की,
लेकिन निदेशक कुछ नहीं बोले...
मै मुस्कुरा कर बोली...
समझदार बोस वही होता है,
जो पेड़ पर उगते फल नहीं गिनता...
लेकिन हर टूटते पत्ते का हिसाब रखता है।
सभी सहकर्मी मुस्कुरा दिए...
फिर लग गए सब अपने अपने काम में,
ऑफिस की वही डिप डिप चाय की चुस्कियां लेते हुए।
सहसा देखा एक सहकर्मी ने...
सबके लिए कही से अदरक वाली चाय मंगाई,
सब के सब खुश हो उठे...
वाह बहुत बढ़िया किया ये.
मै बोली ऐसा लगा रहा है जैसे किसी ने...
कुछ गरीब लोगो को कम्बल बाँट दिए हो...
ठण्ड से बचने के लिए।
और ज़ोरदार ठहाकों के साथ...
फिर से ऑफिस में...
एक ठिठुरता दिन ख़तम.
Tuesday, January 5, 2010
Sunday, January 3, 2010
कितनी उलझन और बवाल
कितनी उलझन और बवाल
एक ख़तम तो नया सवाल.
नए साल पर मांग उधारी
मचा रहे है लोग धमाल
महगाई की झेलो मार
मचा हुआ है हाहाकार.
जेब हुई जाती है हल्की
और खर्चे है अपरम्पार
इंसानों का लगा बाज़ार
रिश्तों में चलता व्यापार
घटिया से नोवेल के सारे
लगते है घटिया किरदार .
टूटी चप्पल जोड़ रहे
नाते रिश्ते तोड़ रहे
अपने दुःख की नहीं खबर
गैर के सुख पे आँख धरे
पैसों की मारा मारी
इसे भरा तो वो खाली
फूल पौध से काम चले न
नोट उगाओ ओ माली
एक ख़तम तो नया सवाल.
नए साल पर मांग उधारी
मचा रहे है लोग धमाल
महगाई की झेलो मार
मचा हुआ है हाहाकार.
जेब हुई जाती है हल्की
और खर्चे है अपरम्पार
इंसानों का लगा बाज़ार
रिश्तों में चलता व्यापार
घटिया से नोवेल के सारे
लगते है घटिया किरदार .
टूटी चप्पल जोड़ रहे
नाते रिश्ते तोड़ रहे
अपने दुःख की नहीं खबर
गैर के सुख पे आँख धरे
पैसों की मारा मारी
इसे भरा तो वो खाली
फूल पौध से काम चले न
नोट उगाओ ओ माली
Friday, January 1, 2010
मै कवि, मै कलाकार...
मै कवि, मै कलाकार...
सपनो की दुनिया से गहरा सरोकार.
जब असली दुनिया से भर जाता दिल
सज जाती है सपनो की महफ़िल.
चाँद से होती है गुफ्तगू..
बादलों पर बैठ कर हो जाती हूँ उड़न छु
हवा के संग हिलते हुए फूलों पर डोलती हूँ ...
नर्म हरे पत्तों की चुनरिया ओढती हूँ...
ओस की मोतियों के जब पहनती हूँ जेवर,
किसी राजकुमारी से कम नहीं होते तब मेरे तेवर.
चाँद से तो मेरा है बरसों का याराना ...
मेरे हर राज़ का है उसके पास खज़ाना .
घास पर टूटी पड़ी पत्तियों के नीचे
मै अक्सर अपनी आँखों को मीचे
करती हूँ गुनगुनी धुप में आराम
पूछना कभी उनको याद है अभी भी मेरा नाम
आसमान पर बैठ कर देखती हूँ पूरी दुनिया
वो बूढी सी दादी, वो नन्ही सी मुनिया
वो छोटा मोनू जिसके लिए हर वो चीज़ लड्डू है जो गोल है
वो संजू किसके लिए प्यार सबसे अनमोल है.
मेरे लिए उतना है आसान आसमान के तारें तोडना...
जितना ज़मीन पर बैठ कर अपनी टूटी चप्पल जोड़ना.
ये सपनो की दुनिया देती है तनाव से आराम..
और आसान हो जाते है कुछ मुश्किल से काम.
सपनो की दुनिया से गहरा सरोकार.
जब असली दुनिया से भर जाता दिल
सज जाती है सपनो की महफ़िल.
चाँद से होती है गुफ्तगू..
बादलों पर बैठ कर हो जाती हूँ उड़न छु
हवा के संग हिलते हुए फूलों पर डोलती हूँ ...
नर्म हरे पत्तों की चुनरिया ओढती हूँ...
ओस की मोतियों के जब पहनती हूँ जेवर,
किसी राजकुमारी से कम नहीं होते तब मेरे तेवर.
चाँद से तो मेरा है बरसों का याराना ...
मेरे हर राज़ का है उसके पास खज़ाना .
घास पर टूटी पड़ी पत्तियों के नीचे
मै अक्सर अपनी आँखों को मीचे
करती हूँ गुनगुनी धुप में आराम
पूछना कभी उनको याद है अभी भी मेरा नाम
आसमान पर बैठ कर देखती हूँ पूरी दुनिया
वो बूढी सी दादी, वो नन्ही सी मुनिया
वो छोटा मोनू जिसके लिए हर वो चीज़ लड्डू है जो गोल है
वो संजू किसके लिए प्यार सबसे अनमोल है.
मेरे लिए उतना है आसान आसमान के तारें तोडना...
जितना ज़मीन पर बैठ कर अपनी टूटी चप्पल जोड़ना.
ये सपनो की दुनिया देती है तनाव से आराम..
और आसान हो जाते है कुछ मुश्किल से काम.
Wednesday, December 30, 2009
कैसे रिश्ते, कैसे नाते...
कैसे रिश्ते, कैसे नाते...
स्वार्थ में उलझे कच्चे धागे.
सामाजिक जन झेल रहे है...
कोई इनसे कैसे भागे?
जहाँ फायदा कुछ दिखता है...
वहीँ नया रिश्ता उगता है,
लालच और बनावट जीती
स्नेह भरा सच अब झुकता है।
चेहरे पर नकली मुस्काने...
मन में नीम करेले पाले,
फूल दिखा कर चुभा रहे है...
तीखे जहरीले से भाले।
टूट रहे वो मन के बंधन,
स्नेह भरे वो मीठे प्याले...
बूढी जर्जर सी कोठी के..
लगते है अब चिपके जाले.
स्वार्थ में उलझे कच्चे धागे.
सामाजिक जन झेल रहे है...
कोई इनसे कैसे भागे?
जहाँ फायदा कुछ दिखता है...
वहीँ नया रिश्ता उगता है,
लालच और बनावट जीती
स्नेह भरा सच अब झुकता है।
चेहरे पर नकली मुस्काने...
मन में नीम करेले पाले,
फूल दिखा कर चुभा रहे है...
तीखे जहरीले से भाले।
टूट रहे वो मन के बंधन,
स्नेह भरे वो मीठे प्याले...
बूढी जर्जर सी कोठी के..
लगते है अब चिपके जाले.
Tuesday, December 29, 2009
उड़ान
तुमने पंख दिए और कहा उड़ो वहां तक
जहाँ पंहुच कर कोई छोर न दिखे
जहाँ पंहुच कर अंत का भी अंत हो जाये
मै उड़ी...
उस ऊंचाई को देख पहले हिचकिचाई
फिर उड़ चली इस विश्वास के साथ
की तुम साथ हो
जब डगमगाई संभाला तुमने
फिर एक दिन तुम डगमगाए
या शायद तुम डगमगाए नहीं
वो तुम्हारा उड़ने का तरीका था
और तुम्हे उस डगमगाहट से सँभालने में
मै भी डगमगा गयी
इतनी ऊंचाई पर पहुँच कर डगमगाने से
शरमाई, घबरायी सी मै
तुमसे नज़र मिलाने से कतराती हुई
उड़ चली दूर
और बैठ कर एक पेड़ की ओट में सोचने लगी
मै क्यों भागी तुमसे नज़रें चुराती हुई?
तुम तो सब जानते थे
मेरी उड़ान, मेरी थकान के बारे में
फिर मेरा डर मेरी घबराहट तुम्हे समझ क्यों नहीं आई?
क्यों तुमने कहा...
ठीक है बैठी रहो उस पेड़ की ओट में
अगर तुम डरती हो डगमगाने से
साथी होने के नाते
कोई ऐसा रास्ता भी तो बता सकते थे
जिसपर चलते हुए मुझे डगमगाना न पड़े
लेकिन अब उस डगमगाहट ने सिखा दिया मुझे
लड़खड़ा कर संभालना
बिना डर के उड़ना
अब मेरी उड़ान तुमसे ऊपर है
और मै जानती हु जब तुम ऊपर देखते हो
तो शर्मिंदा से सोचते हो
इतनी जल्दी क्यों की तुमने निर्णय लेने में.
लेकिन पछताओ मत
मै आज भी तुम्हारे साथ हूँ
तुम्हारी उड़ान और डगमगाहट में
क्यों की मेरी आदत है ज़मीन की और देखते हुए चलना
इसलिए नहीं की उड़ने से ज्यादा मुझे चलना पसंद है
बल्कि इसलिए की नीचे देखने पर तुम दिखाई देते हो.
जहाँ पंहुच कर कोई छोर न दिखे
जहाँ पंहुच कर अंत का भी अंत हो जाये
मै उड़ी...
उस ऊंचाई को देख पहले हिचकिचाई
फिर उड़ चली इस विश्वास के साथ
की तुम साथ हो
जब डगमगाई संभाला तुमने
फिर एक दिन तुम डगमगाए
या शायद तुम डगमगाए नहीं
वो तुम्हारा उड़ने का तरीका था
और तुम्हे उस डगमगाहट से सँभालने में
मै भी डगमगा गयी
इतनी ऊंचाई पर पहुँच कर डगमगाने से
शरमाई, घबरायी सी मै
तुमसे नज़र मिलाने से कतराती हुई
उड़ चली दूर
और बैठ कर एक पेड़ की ओट में सोचने लगी
मै क्यों भागी तुमसे नज़रें चुराती हुई?
तुम तो सब जानते थे
मेरी उड़ान, मेरी थकान के बारे में
फिर मेरा डर मेरी घबराहट तुम्हे समझ क्यों नहीं आई?
क्यों तुमने कहा...
ठीक है बैठी रहो उस पेड़ की ओट में
अगर तुम डरती हो डगमगाने से
साथी होने के नाते
कोई ऐसा रास्ता भी तो बता सकते थे
जिसपर चलते हुए मुझे डगमगाना न पड़े
लेकिन अब उस डगमगाहट ने सिखा दिया मुझे
लड़खड़ा कर संभालना
बिना डर के उड़ना
अब मेरी उड़ान तुमसे ऊपर है
और मै जानती हु जब तुम ऊपर देखते हो
तो शर्मिंदा से सोचते हो
इतनी जल्दी क्यों की तुमने निर्णय लेने में.
लेकिन पछताओ मत
मै आज भी तुम्हारे साथ हूँ
तुम्हारी उड़ान और डगमगाहट में
क्यों की मेरी आदत है ज़मीन की और देखते हुए चलना
इसलिए नहीं की उड़ने से ज्यादा मुझे चलना पसंद है
बल्कि इसलिए की नीचे देखने पर तुम दिखाई देते हो.
Monday, December 28, 2009
सांवली परी
देखा मैंने एक सांवली परी को
बिखरे हुए बाल और काजल लगी आँखे
सूती फ्राक और घिसा हुआ स्वेटर
घुटनों के बीच हाथों को सिकोड़े हुए
खुद को ठिठुरन से बचाने की कोशिश करती हुई
एक ठेले पर बैठी चली जा रही थी
मै गर्म सूट और नर्म टोपी लगाये हुए
ऑफिस जाने की जल्दी में
पति की स्कूटर की पिछली सीट पर बैठी
रेलवे क्रोसिंग के खुलने का इन्जार कर रही थी
और साथ ही साथ उस ठण्ड को...
महसूस करने की कोशिश करती रही
जिसे वो अभी झेल रही थी
दूसरे दिन फिर दिखी मुझे एक और नन्ही परी
जो पहली परी से भी छोटी थी
लगभग तीन साल की वो परी
अपने भाई का हाथ पकडे
भागी चली जा रही थी
अपने नन्हे नंगे पैरों पर चुभने वाले...
किसी भी कांटे की परवाह किये बिना
मै सोच ही रही थी की कुछ करू इसके लिए
तभी साथ खड़ी मेरी मित्र बोली
देख रही हो उस बच्ची को
तीन दिन पहले मैंने इसे एक जोड़ा जूते दिए थे
ताकि उन्हें पहन कर ये ठण्ड से बच सके
लेकिन उसे जूते न पहना देख जब मैंने पूछा
की क्यों अभी तक तुमने वो जूते नहीं पहने
वो बोली माँ कहती है वो जूते पहन लूगी
तो और नहीं मिलेगे
बिखरे हुए बाल और काजल लगी आँखे
सूती फ्राक और घिसा हुआ स्वेटर
घुटनों के बीच हाथों को सिकोड़े हुए
खुद को ठिठुरन से बचाने की कोशिश करती हुई
एक ठेले पर बैठी चली जा रही थी
मै गर्म सूट और नर्म टोपी लगाये हुए
ऑफिस जाने की जल्दी में
पति की स्कूटर की पिछली सीट पर बैठी
रेलवे क्रोसिंग के खुलने का इन्जार कर रही थी
और साथ ही साथ उस ठण्ड को...
महसूस करने की कोशिश करती रही
जिसे वो अभी झेल रही थी
दूसरे दिन फिर दिखी मुझे एक और नन्ही परी
जो पहली परी से भी छोटी थी
लगभग तीन साल की वो परी
अपने भाई का हाथ पकडे
भागी चली जा रही थी
अपने नन्हे नंगे पैरों पर चुभने वाले...
किसी भी कांटे की परवाह किये बिना
मै सोच ही रही थी की कुछ करू इसके लिए
तभी साथ खड़ी मेरी मित्र बोली
देख रही हो उस बच्ची को
तीन दिन पहले मैंने इसे एक जोड़ा जूते दिए थे
ताकि उन्हें पहन कर ये ठण्ड से बच सके
लेकिन उसे जूते न पहना देख जब मैंने पूछा
की क्यों अभी तक तुमने वो जूते नहीं पहने
वो बोली माँ कहती है वो जूते पहन लूगी
तो और नहीं मिलेगे
Sunday, December 27, 2009
गुम हुए तुम फिर भी कोई नूर सा फैला गए..
आस्मां से कुछ फ़रिश्ते इस ज़मीं पर आ गए...
तुम तो जा बैठे हो छुपकर जाने किसकी ओट में...
नम सा मौसम करके कितनी बारिशें बरसा गए.
याद तुमको हम करें ऐसा कभी होता नहीं...
भूलने की कोशिशों में यादों पर तुम छा गए.
खूबसूरत चेहरे न मुझको लुभा पाए कभी...
रूह जब देखी तुम्हारी तुम तभी से भा गए।
जब तलक थे साथ तुम खुशियों के मौसम थे तमाम...
साथ जबसे तुम नहीं, गम आये आकर न गए.
लेके इतना नेक दिल किसने कहा था आइये...
आये थे तो क्यों गए हमपर सितम क्यों ढा गए?
आस्मां से कुछ फ़रिश्ते इस ज़मीं पर आ गए...
तुम तो जा बैठे हो छुपकर जाने किसकी ओट में...
नम सा मौसम करके कितनी बारिशें बरसा गए.
याद तुमको हम करें ऐसा कभी होता नहीं...
भूलने की कोशिशों में यादों पर तुम छा गए.
खूबसूरत चेहरे न मुझको लुभा पाए कभी...
रूह जब देखी तुम्हारी तुम तभी से भा गए।
जब तलक थे साथ तुम खुशियों के मौसम थे तमाम...
साथ जबसे तुम नहीं, गम आये आकर न गए.
लेके इतना नेक दिल किसने कहा था आइये...
आये थे तो क्यों गए हमपर सितम क्यों ढा गए?
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