Friday, December 25, 2009

खुशियों के लम्हों की कीमत मुझसे पूछो...
गम पल में कैसे आते है मैंने देखा,
हर मुस्कान के पीछे का सच ख़ुशी नहीं है,
झूठ बोलती है अक्सर वो टेढ़ी रेखा.

Tuesday, December 22, 2009

वो भी औरत और तुम भी...

वो भी औरत और तुम भी...
उसकी आँखे भी कजरारी और तुम्हारी भी
उसकी पलकें भी झुकी हुई और तुम्हारी भी
उसका चेहरा ढका हुआ सिर्फ आँखे दिख रही
तुम्हारा चेहरा भी ढका हुआ सिर्फ आँखे दिख रही
तुम्हारा चेहरा छुपा है लेपटोप के पीछे
जिसमे डाटा केबल लगाये हुए....
इन्टरनेट पर तुम जुड़ रही हो सारी दुनिया से,
लेकिन उसका चेहरा छुपा है काले से नकाब के पीछे
जिसमे सिमट कर वो खुद को....
दुनिया से छुपाने की कोशिश कर रही है.

Tuesday, December 15, 2009

महसूस करना

महसूस करना कभी कभी शाम कितनी खूबसूरत लगती है
जब ढलते हुए सूरज की सुनहरी रौशनी
दरवाजों से झांकते हुए फर्श पर बिखरती है.

हाथ में गर्म चाय का प्याला लिए हुए
आसमान की और देखना
न जाने कितने परिंदों के झुण्ड अपने घोसलों को लौटते है

मस्जिदों की अज़ान और मंदिरों के घंटे न जाने कैसी कशिश पैदा करते है
इन सबके बीच याद आते है वो दिन...
जब पापा ऑफिस से आते थे,

माँ बड़े करीने से तैयार होती थी
अपने लम्बे बालों की चोटी बनाती माथे पर कुमकुम लगाती
और कंघी की नोक से सिन्दूर की एक पतली सी रेखा अपनी मांग में भरती

और मै बड़े ध्यान से उन्हें ऐसा करते देखती
और सोचती रह जाती
ये माँ है या परी

मुझे बड़ा अच्छा लगता जब माँ करवाचौथ पर
शादी की पीली सितारों वाली साडी पहनती थी
पैरों में आलता लगाती और पूजा की थाल लेकर मंदिर जाती

शाम को पापा जब ऑफिस से आते, हाथों में ताज़ी दातुन , फलों का थैला
और कभी कभी एक बड़ा सा तरबूज साथ लाते
जिसे पूरा परिवार एक साथ बैठ कर खाता था

अब न वो दिन है न पापा, लेकिन फिर भी शाम तो है
जो हर रोज़ आती है,
नित नयी कहानी कहने.

Thursday, December 10, 2009

तुम्हारा काम मै अब तक न कर सकी

तुमने कहा था...
पूरा कर देना मेरा वो काम,
जो अधूरा पड़ा है न जाने कबसे.
सदियाँ बूढ़ी हो गयी...
पर्वत परतों का खज़ाना इकठ्ठा करते रहे...
फूल खिल खिल कर गिरते रहे...
सितारे आवारा बनकर फिरते रहे....
लेकिन तुम्हारा काम मै अब तक न कर सकी.

वो नन्हा पौधा जिसको लगाते समय,
मैंने देखा था
वो ढक गया था मेरे तन की छाया से...
आज उसकी छाया में बैठी हूँ मै,
लेकिन तुम्हारा काम मै अबतक न कर सकी.

वो खुली खुली कालोनी
जिसमे रहती थी सपना और सलोनी,
जिसके इस छोर से उस छोर तक
पतंग से लेकर डोर तक
मंडराते थे हम शोख तितलियों की तरह
और गायब हो जाते थे पलभर में
आसमान की बिजलियों की तरह

वो कालोनी भी अब तंग हो गयी है
और वो पतंग भी न जाने कहा खो गयी है
वो नन्ही तितलियाँ अब बहुत शर्माती है
घर से बाहर निकलते हुए घबराती है
लेकिन तुम्हारा काम मै अबतक न कर सकी.

तेल लगाकर चोटी करने वाली...
ढेर सारी किताबों को बस्ते में भरने वाली
वो रंजू भी अब समझदार हो गयी है
उसके वो तेल लगे बाल अब हवा में लहराते है
उसके वो बंद होंठ अब चहचहाते हैं
उसके तन से अब उठती है महक
उसकी आवाज़ में अब रहती है खनक
अब वो हो गयी है अकलमन्द
लेकिन तुम्हारा काम अभी तक पड़ा है बंद.

वो कोमल मन जो सोचता था ....
गुड़िया की शादी कैसे रचाएंगे?
गुड्डे का घर कैसे बसायेंगे?
वो बिल्ली जो भीग गयी थी बारिश में...
उसे अब कहा छिपाएंगे?
उस मन को अब इंसानियत भी याद नहीं है
क्योंकि ये आज है कल के बचपन की बात नहीं है

जिस ओर घुमाई मैंने आँखे..
उस ओर सुनाई दी पुरानी सिसकती सांसे,
पुरानी कील पर एक नया कलेंडर
पुरानी गैस में एक नया सिलेंडर
पुरानी दीवार पर नयी पुताई
पुरानी ज़मीन पर एक नयी चटाई
ये सब है संभव
पर क्या संभव है पुराना तन और नया मन?

सबकुछ बदल गया पर नहीं बदला
मेरे तन का वो पुराना मन
मेरा वो बीता हुआ बचपन
जो चला आया अचानक सोते से जागकर
सालों, दिनों और महीनो की कैद से भागकर
रहता है वो मेरे मन में अमर बनकर
और मचल उठता है कभी कभी लहर बनकर

शायद इसीलिए मै तुम्हारा काम अभी तक न कर सकी
क्योंकि तुम भी बदल चुके हो
आधुनिक मानवो के साथ
भावनाओ रहित दानवो के साथ

काम निकलने के बाद तुम तो चल दोगे अपने रास्ते पर
नोटों की रोटी और सिक्कों की सब्जी के नाश्ते पर
पर मेरा ये पुराना मन तुम्हारी पुरानी यादों को कैसे भुलायेगा?
तुम तो चले जाओगे पर ये यादें कौन ले जायेगा?

इसलिए तुम आते रहो
और पूछते रहो अपने काम का हाल
और मै फिर यही कहूगी
न जाने क्यों मै तुम्हारा काम अबतक न कर सकी.

Wednesday, December 9, 2009

तुम्हारे नाम की वो ग्रीन लाइट

हम मिले वैसे ही जैसे मिलते है आज के युग के मित्र
ऑनलाइन वेबसाइट पर
न जाने तुम क्या खोजते हुए पहुंचे गए मेरी प्रोफाइल तक
और मंत्रमुग्ध से मान बैठे मुझे अपनी रशियन नोवेल की नायिका सा
जो बचपन से तुम्हारे मन में सेंध लगाये बैठी थी

तुम भी कम नहीं थे किसी से
सांवले सलोने, मोहक मुस्कान लिए
अपने शब्दों के तिलिस्म में....
किसी को भी कैद करने की क्षमता रखने वाले

जब भी तुम्हे सुनती सोचती कहाँ से आये हो तुम
इतना स्नेह किसी में कैसे हो सकता है?
कोई कैसे किसी को इतना चाह सकता है?
क्या मै इतने स्नेह के योग्य हूँ?

नहीं इतना समर्पण, इतना स्नेह अब बचा ही कहाँ मुझमे
जो था सब उड़ेल दिया घर परिवार में
ऐसा नहीं की तुम्हे सोचती नहीं
तुम्हारे लिए कोई भावना नहीं मन में

लेकिन तुम्हारे आगे सदा खुद को बौना पाया
इसलिए धीरे धीरे खुद को दूर कर दिया तुमसे
तुमसे कहा स्नेह नहीं मित्रता ही सही
पर तुम ठहरे आर या पार, स्नेह के सिवा कुछ नहीं

तुम्हारा स्नेह अब क्रोध बन चुका है
हटा दिया है तुमने मुझे अपनी प्रोफाइल, मेलबोक्स और स्क्रैप से
लकिन फिर भी मै चाहती हूँ की जब मै ऑनलाइन रहूँ
तो तुम्हारे नाम की वो ग्रीन लाइट जलती रहे
और मुझे ये आभास होता रहे की मेरा एक परम मित्र मेरे साथ है...:)

Tuesday, December 8, 2009

लम्हे

लम्हों को समेटना आसान नहीं...
चलते फिरते , सोते जागते समेटती रहती हूँ इन्हें
लेकिन बिखर ही जाते हैं.

कभी तकिये के सिरहाने छिपाती हूँ इन्हें,
कभी बांध लेती हूँ दुपट्टे के पल्लू में,
कभी छिपाती हूँ मन के कोने में...
तो कभी यूँ ही बिखेर देती हूँ ये सोचकर,
की फिर से समेट लूंगी इन्हें कुछ और नए लम्हों के साथ.

कुछ लम्हे बहुत हसीन है,
गुदगुदा जाते है मन को.
कुछ दर्द देते है चुभ से जाते है,
कुछ लम्हे हँसाते हैं,
और कुछ आँखों से फिसल कर...
गालों को नम कर जाते है.

तुम भी समेटना इन लम्हों को,
बड़े प्यार से, करीने से सजाना इन्हें,
क्योंकि जिंदगी के उन पलों में जब कोई साथ नहीं होता
ये लम्हे बहुत काम आते है.

तुम्हारे सर को अपने कन्धों पर रखकर
प्यार से सहलातें है,
ये एहसास करते है...
की तुम दुनिया में अकेले नहीं.

कभी बुलाकर देखना इन्हें...
ये समय की परवाह किये बगैर,
दौड़ते हुए आयेंगे.

तुम्हारी बाँहों को थाम कर,
तुम्हारे दिल का हाल सुनेगे,
कुछ अपनी भी सुनाएँगे.

और मुस्कुरा कर कहेंगे
Don’t worry be happy यार
मै हमेशा तुम्हारे साथ हूँ...
हर पल एक नए लम्हे के साथ.

Sunday, December 6, 2009

कविता

फिर चिटका मन और बह निकली कविता…
भरमाई, भोली सी, भीगी कविता,

सुख में साथ नहीं थी दूर खड़ी थी…
दुःख आया तो संग संग आई कविता,

नैनों में भर आये हर आंसू को…
सीपी में मोती सा रखती कविता,

भावों का करके सिंगार मनोहर…
पन्नों के घूँघट से ढकती कविता,

साथ नहीं जब संगी साथी कोई…
साथ निभाती, हाथ बढ़ाती कविता,

चुप सी काली रातों में भी जागी...
मुझे सुलाने की प्रयास में कविता,

जीवन के सारे भारी पल लेकर,
मन का सारा बोझ मिटाती कविता...

साथ बहुत से छूटे धीरे धीरे
साथ निभाती अंत समय तक कविता.