Sunday, January 10, 2010

दुनिया की गडित मेरे पल्ले नहीं पड़ती...

दुनिया की गडित मेरे पल्ले नहीं पड़ती,
मै फायदा देख कर आगे नहीं बढती.
मुझे नहीं पसंद गोरे चेहरे और काले दिल वालों की चमचागिरी,
मुझे तो लगती है भली हर वो बात जो है सोने सी खरी.
मुझे कपड़ों और गहनों से ज्यादा लम्हों की खूबसूरती भाती है,
मुझे पसंद है वो खुशबु जो मंदिर में धूप जलाने से आती है.
बातों को बढ़ा चढ़ा कर बोलना मुझे नहीं आता,
मै नहीं खोल सकती बात बात पर झूठ का खाता.
मेरे मंदिर में अल्ला, राम, खुदा सालों से साथ साथ रहते हैं,
फिर लोग क्यों ज़मीन बाटो, देश बाटो कहते है?
मुझे कभी नहीं लुभा पाता कीमती कपड़ों में दमकता रूप,
मुझे भाती है खुले दिमाग की गुनगुनी धूप.
मै कोई संत नहीं जिसमे मोह नहीं माया नहीं,
लेकिन मै जो हूँ वो हूँ, खुद को छुपाना मुझे आया नहीं।

मै अक्सर देखती हूँ छोटे छोटे फायदों के लिए पलते षड्यंत्र,
कब सीखेगे लोग जीवन जीने का असली मन्त्र?

5 comments:

  1. मुझे कपड़ों और गहनों से ज्यादा लम्हों की खूबसूरती भाती है,
    मुझे पसंद है वो खुशबु जो मंदिर में धूप जलाने से आती है.


    -आज के भौतिकवादी युग में कौन न चाहेगा इस ओर लौटना...सुन्दर अभिव्यक्ति!!

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  2. मेरे मंदिर में अल्ला, राम, खुदा सालों से साथ साथ रहते हैं,
    फिर लोग क्यों ज़मीन बाटो, देश बाटो कहते है?

    धर्म, प्रांत, भाषा के नाम पर चलने वाली दुकानें फिर बंद नहीं हो जाएंगी...

    जय हिंद...

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  3. ऐसा भी होता है क्या कि सोंच हो मेरी और शव्द आपके ?
    हमखयाल पाया अच्छा लगा |
    इतने सुंदर विचारो की अभिव्यक्ती के लियो बधाई |

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  4. कब सीखेगे लोग जीवन जीने का असली मन्त्र?

    बस इतनी सी तो बात है .......... अगर सभी ये बात समझ सकें तो फिर बात ही क्या .........

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  5. Hi Ranjanaji…Aapki kavita "Aapke Jane ke baad" sachmuch me dil ki gaharai se likhi hui rachana hai. Jaishankar Prasadji ne tabhi apani Kamayani me kaha hai pahala kavi vahi raha hoga jisaki hriday ki gaharai se ek aah si nikali hogi aur vahi aah ek anjan kavita ban kar bah nikali hogi. Aapki ye poem is baat ki pratyaksh example hai…

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