Thursday, May 13, 2010

टूटी बिखरी किरचों को मै चिपकाती रहती हूँ
गीत अधूरा या हो पूरा गुनगुनाती रहती हूँ
रंग बिरंगे लम्हे सीकर चादर सी बुन ली है
बेरंगे लम्हों में उसे ओढ़कर सो जाती हूँ

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर
    यही सही है

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  2. लम्हों का लिहाफ.. बढ़िया है

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  3. bahut sunder tareeka raahat pane ka.......

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  4. VERY OPTIMISTIC VIEWS.ENJOYED READING.KEEP IT UP.

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