Saturday, May 29, 2010

कागज़ को प्यार से सहलाकर


कागज़ को प्यार से सहलाकर
खुशबुओं से नहलाकर
सोचती हूँ लिखू
कोई प्यार भरा गीत

जिसमे तारों भरे आसमान तले
जुगनू टिमटिमाते हो
हवा के झोंके जहाँ बिना किसी
खिड़की, दरवाज़े से टकराए हुए आते हों

जहाँ एक दूसरे के सुख से बढ़कर
कोई चाह न हो
जहाँ अलग कर देने वाली
कोई राह न हो

जहाँ किसी को समझने के लिए
लफ़्ज़ों की नहीं दिल की ज़रूरत हो
जहाँ चेहरे नहीं
नियत खूबसूरत हों

जहाँ लोग क्या कहेगे
कहने वाला कोई न हो
जहाँ मासूमियत ने
अपनी सूरत धोयी न हो

जहाँ शान के लिए
जान बिकती न हो
जहाँ इंसानों में हैवानियत
दिखती न हो

11 comments:

  1. सुन्दर कल्पना . प्रशंसनीय ।

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  2. प्रेमासक्ति की आदर्श स्थिति।

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  3. वाकई एक मासूम अभिव्यक्ति...

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  4. बहुत ही सुन्दर रचना, और भाव हैं!
    www.mathurnilesh.blogspot.

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  5. मेरे नए ब्‍लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्‍ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।

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  6. Bahut sunder masoom se bhavo kee prashansneey abhivykti.......

    durlabh to nahee lagee na chah......?

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  7. जहाँ शान के लिए
    जान बिकती न हो
    जहाँ इंसानों में हैवानियत
    दिखती न हो

    -सुन्दर भाव!

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  8. पुरुष की आंख कपड़ा माफिक है मेरे जिस्‍म पर http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_9338.html मेरी नई पोस्‍ट प्रकाशित हो चुकी है। स्‍वागत है उनका भी जो मेरे तेवर से खफा हैं

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  9. Hi..

    Geet pyaar ka padhkar tera..
    Lagne laga hai humko ye..
    Ho sab gar tere geet ke jaisa..
    Duniya sundar hamen lage..

    Aaj pahli baar aapke blog par aaya..achha laga aapki kavita padhkar..

    Aaj se apke blog ka follower bhi hun..

    DEEPAK..
    www.deepakjyoti.blogspot.com

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