Tuesday, May 25, 2010

स्नेह का दीप जलाते वक़्त
सोचा नहीं होगा उसने
की केवल उन्ही दीपों को
जलने का अधिकार
दिया है इस समाज ने
जो जलते है मंदिरों में,
घर की मुंडेर पर
या मृत्यु पश्चात सिराहने पर.
इसीलिए छुपाती फिरी वो
अपने स्नेह दीप को
लेकिन प्रेम का प्रकाश
कब रुका है रोकने से?
पर उसकी रौशनी अँधेरा कर गयी
उसी के जीवन में जिसने
जलाया था वो दीप
क्योंकि....
समाज भी तो कोई चीज़ है
कैसे मिल जाने देता दो दिलो को
परिवार वाले कैसे मुंह दिखाते समाज को
तो चलो एक हत्या ही सही
रिश्तों की, स्नेह की, सपनो की
एक जान ही तो गयी
आन, मान, शान तो बाकि है
अभिमान तो बाकि है
बेटी तो वैसे भी विदा होती
डोली न सही अर्थी ही सही
तो लो हो गयी बेटी विदा
और आसमान के घूँघट से
झांक कर पूछ रही है
माँ...
जान ज्यादा कीमती होती...
है या अभिमान?

6 comments:

  1. behad achhi kavita..honour killing ko aadhar bana kar likhi gayio yah rachna prashanshaniya hai ..

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  2. sahi kaha aajkal jaati ke adhaar pe ho rahi manmaani ek din samaaj ko mehngi padegi...

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  3. बहुत सही.बेहतरीन रचना!

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  4. Great! its touching and full of truthness.

    Amit K Tyagi at http://yezindagihain.blogspot.com/

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  5. insaan ye kyo bhool jata hai ki samaj usase hai . bahut sarthak rachana...

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