Tuesday, December 22, 2009

वो भी औरत और तुम भी...

वो भी औरत और तुम भी...
उसकी आँखे भी कजरारी और तुम्हारी भी
उसकी पलकें भी झुकी हुई और तुम्हारी भी
उसका चेहरा ढका हुआ सिर्फ आँखे दिख रही
तुम्हारा चेहरा भी ढका हुआ सिर्फ आँखे दिख रही
तुम्हारा चेहरा छुपा है लेपटोप के पीछे
जिसमे डाटा केबल लगाये हुए....
इन्टरनेट पर तुम जुड़ रही हो सारी दुनिया से,
लेकिन उसका चेहरा छुपा है काले से नकाब के पीछे
जिसमे सिमट कर वो खुद को....
दुनिया से छुपाने की कोशिश कर रही है.

10 comments:

  1. वाह क्या बात कही है .... सब कुछ समान होते हुवे भी कितना जुदा ..........

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति-आभार

    कृपया वर्ड वेरिफ़ि्केशन हटा ले। धन्यवाद

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  3. अच्छा लिखा है आपने शुक्रिया

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  4. trying to combine two ends in one...Well versed!!

    Smiles :)
    Prashant

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  5. बहुत समग्रता से कही गयी बात । आपने दूसरी ओर भी नजर फिरा ली । आभार ।

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  6. bahut acchi rachna
    badhai swikaren

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  7. bahut dil ko choo jane walee kavita.
    samaj ne kitne bandhan jod diye hai jeevan se sath hee dharm aur maryada ka vasta diya jata hai. aabhar!

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  8. विसंगती को आपने बखूबी उकेरा है. फर्क तो यहाँ है.
    बहुत सुन्दर रचना

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  9. नसीब अपना अपना .

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