Thursday, June 13, 2013


जिंदगी का पलंग

जिंदगी का पलंग
इतना है तंग
की लेते ही करवट
लुढ़क जाती हूँ

ठंडी ज़मीन
जब रास नहीं आती
तो खुद को समेट
कर सिमट जाती हूँ

देखती हूँ
पलंग के नीचे
तो कुछ खोयी हुई पुरानी चीज़ें
पड़ी पाती हूँ

मेरे जूड़े की स्टिक
कुछ रंग बिरंगी बिंदिया
कुछ टुडे मुड़े ख्वाब
बटोर लती हूँ

और फिर से
जिंदगी के पलंग पर लेट
कुछ गुनगुनाती हूँ
कुछ ख्वाब सजाती हूँ 

 - रंजना डीन

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