Wednesday, August 17, 2011

हम गुज़ारिश क्यों करे

हम गुज़ारिश क्यों करे
उनसे सिफारिश क्यों करें
यूँ उदासी ओढ़ कर
अश्कों की बारिश क्यों करे

ले हुनर और हौसला
जुट जाएँ हम मैदान में
हम करें ख़ारिज उन्हें
हमको वो ख़ारिज क्यों करें

सोच के पंखों को हम
परवाज़ दें कुछ इस कदर
ढूंढे नयी मंजिल
गए जख्मों में खारिश क्यों करें

10 comments:

  1. यूँ उदासी ओढ़ कर
    अश्कों की बारिश क्यों करे

    बहुत खूब ..सुन्दर रचना

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  2. रंजना जी
    नमस्कार !

    हम करें ख़ारिज उन्हें
    हमको वो ख़ारिज क्यों करें

    वाऽऽह ! क्या ख़ुद्दारी की बात कही है !

    आपके ब्लॉग पर अन्य रचनाएं भी पढ़ीं … अच्छी लगीं ।


    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. कल 31/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. ले हुनर और हौसला
    जुट जाएँ हम मैदान में
    हम करें ख़ारिज उन्हें
    हमको वो ख़ारिज क्यों करें
    बहुत ही मार्मिक अनोखे ढंग से लिखी बेमिसाल रचना /बहुत बधाई आपको /

    please visit my blog
    www.prernaargal.blogspot.com
    thanks

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  5. बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने

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  6. सोच के पंखों को हम
    परवाज़ दें कुछ इस कदर ..बहुत खूब रंजनाजी ....बेहद सुन्दर रचना ...

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  7. बहुत प्रेरणादायक

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