Monday, May 16, 2011

आओ ढूँढ निकाले
सारी परेशानियाँ
घर के हर कोने से,
दिमाग से
ऑफिस की पोलिटिक्स से
रिश्तों के ताने बाने से
फैलते खर्चों से
घटती आमदनी से
बढती जरूरतों से
गर्मी के उफान से
उम्र की ढलान से
बच्चों की मोटी फीस से
मन की टीस से
और फिर सलेक्ट आल करके
दबा दे डिलीट का बटन
फिर रिसाइकिल बिन को भी
खंगाल डाले
न रहे परेशानियाँ
न उनका कोई निशान
और फिर जिंदगी को जिए
सीना तान....

...जानती हूँ मै
बहुत बचकाना सा ख्वाब है ये
पर सुनी है मैंने ये कहावत
की जब ख्वाब ही देखने है तो
किचड़ी का क्यों??
बिरियानी का देखो...:)

10 comments:

  1. ख्वाब है बेशक पर ख्वाबों पर पाबन्दी तो नहीं है

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  2. बहुत बढ़िया.

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  3. बहुत खूब अच्छी प्रस्तुति ..... शुभकामनायें

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  4. badhiya ...dikkat ye hai ki n to ham mashini hain , n machine ki tarah ye sab ho sakta hai.

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  5. सच में बहुत सुंदर विषय को बेहतर तरीके से शब्दों में पिरोया गया है। वाकई रुचिकर है। संदेश भी है कविता में..

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  6. रिश्तों के ताने बाने से
    फैलते खर्चों से
    घटती आमदनी से
    बढती जरूरतों से
    गर्मी के उफान से
    उम्र की ढलान से
    बच्चों की मोटी फीस से
    मन की टीस से

    Bahut Sundar !

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  7. बहुत बढ़िया कविता है.

    सादर

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  8. bahut sunder....
    aaapne sahi bola...

    good wishes

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