Monday, June 14, 2010

बूंदे


लटों में उलझी बूंदे
यूँ लगती है जैसे
काली रात ने
उलझा लिए हैं खुद में
ढेर सारे सितारे,
और वो गिर रहे हैं
टूट टूट कर.
कधों से फिसलती
इधर उधर गुज़रती
गुदगुदी लगाती ये बूंदे,
बताती है पलों का मोल.
दो पल ठहरती हैं
और बिखर जाती हैं,
पर ज़मीन पर
रंगत बिखेर जाती हैं.

13 comments:

  1. wah kya baat hai........?
    kya bhav hai...............?
    adbhut....... abhivykti...........

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  2. बहुत सुन्दर भाव-चित्र।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  3. दो पल ठहरती हैं
    और बिखर जाती हैं,
    पर ज़मीन पर
    रंगत बिखेर जाती हैं...

    बूंदें ही ना नेह वर्षा की
    या जीवन के कुछ ख़ास हसीं पल भी तो ...

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  4. सादर !
    मनमोहक प्रस्तुति |
    रत्नेश

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  5. बेहतरीन प्रस्तुति!

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  6. uss do pal, jab wo thahrati hai.........ek sansani, ek unmaad laa deti hai........aisee hai bunde........:)

    ek khubsurat rachna!!

    aage se barabar aaunga......:)
    kyonki follow kar liya...:D

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  7. साथियो, आभार !!
    आप अब लोक के स्वर हमज़बान[http://hamzabaan.feedcluster.com/] के /की सदस्य हो चुके/चुकी हैं.आप अपने ब्लॉग में इसका लिंक जोड़ कर सहयोग करें और ताज़े पोस्ट की झलक भी पायें.आप एम्बेड इन माय साईट आप्शन में जाकर ऐसा कर सकते/सकती हैं.हमें ख़ुशी होगी.

    स्नेहिल
    आपका
    शहरोज़

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  8. बूँदें बारिश की ... क्या से क्या कर जाती हैं ... इतिहास रच जाती हैं ...

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