Sunday, April 14, 2013












याद की सियाही 

याद की गहरी सियाही 
फिर टपक कर बह रही  है 
कागजों पर भूली बिसरी 
बात फिर से कह रही है 
चुभ रही है निब की पैनी धार
इसके तन बदन पर 
ज़ख्म ये सदियों से सहकर 
बात अपनी कह रही है 

                    - रंजना डीन 



6 comments:

  1. उम्दा ,भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

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  2. यादों की ये गहरी स्याही मिट्टी नहीं कभी ...
    उम्दा ...

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