Saturday, September 24, 2011

कुछ लिखा कुछ अनलिखा सा रह गया


कुछ लिखा कुछ अनलिखा सा रह गया
वक़्त का हर वार हँस कर सह गया
हाँ बहुत भारी था, वो लम्हा मगर
अश्क की एक बूँद के संग बह गया

ख्वाब जो देखा था मैंने रातभर
सुबह की पहली किरण संग ढह गया
कुछ भी हो पर हौसला मत हारना
घोंसला बुनता परिंदा कह गया

5 comments:

  1. ख्वाब जो देखा था मैंने रातभर
    सुबह की पहली किरण संग ढह गया
    कुछ भी हो पर हौसला मत हारना
    घोंसला बुनता परिंदा कह गया

    बहुत खूबसूरत बात कही है ..सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. क्या सोंच है गजब वाह वाह .....

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  3. कुछ लिखा कुछ अनलिखा सा रह गया
    वक़्त का हर वार हँस कर सह गया
    हाँ बहुत भारी था, वो लम्हा मगर
    अश्क की एक बूँद के संग बह गया

    ...लाज़वाब अहसास..बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  4. lajwab prastuti...shubhakamnaaye

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