Friday, July 25, 2014

सुखमनी


इक्कीस बरस की थी सुखमनी 

जब आई थी ब्याह के

तब पता न था उसे

की जीतू के स्वभाव का

शादी के कुछ दिन बाद ही से

डराता धमकाता रहा वो

और वो डरती रही

निभाती रही मान इसे अपनी किस्मत

शादी के दो साल बाद

जब वो हुई पेट से

लड़ायी बदस्तूर जारी रही

चलती रही मारपीट भी

जीतू चला जाता काम पर

सुबकती रहती घर पर वो

बच्चा हुआ पर दिमाग से कमज़ोर

जीतू कोसता रहता उसे 

और वो कोसती रहती खुद को

खुद को व्यस्त रखने के लिए

उसने शुरू कर दी सिलाई घर से

उसकी भोलापन और मेहनत काम आई

वो करने लगी अच्छी कमाई

जीतू ने जब ये देखा

तो अपनी अकल लगायी

बोला इतना कुछ अकेले कैसे सम्भालोगी

तुम हो सीधी ज़माना है खराब

मैं सम्भालूंगा पैसों का हिसाब किताब

सुखमनी मान गयी उसकी बात

अब घर पर होने लगी दावतें

पीने लगा जीतू शराब

कम हो गए सुखमनी के ग्राहक

और बिगड़ गया घर का हिसाब किताब

और जीतू ने कर दिया अब नौकरी करने से इंकार 

सुखमनी में तब भी न मानी हार

करने लगी नौकरी दर्ज़ी की दुकान पर

वो सुबह जल्दी उठ जाती

घर का सारा काम निबटाती, खाना बनाती

और दिनभर खटती दुकान पर 

शाम को घर पर कदम रखते ही

शुरू हो जाती फरमाइशें 

सबसे पहले जीतू मांगता पैसे शराब के

और बता कर जाता की खाने में क्या बनाना है

शराब में धुत्त होकर आता

उसे चार गालियाँ सुनाता

यूँ ही चल रही है सुखमनी की ज़िंदगी

हमें सिर्फ सुनना चाहिए चटखारे लेकर

या कुछ करना भी चाहिए???


- रंजना डीन

4 comments:

  1. बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
    अभिव्यक्ति........

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  2. Sateek vivechna antas tak pahuchte shabbd....

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  3. अभिव्यक्ति का अनोखा अंदाज |

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  4. shabd nahi hain us ahsas ke. Sukhmani ki kahani antartam tak tees de gayi. Yaad ayee Jai Shankar Prasad ki Dhruvswamini ki, jis ki lines hain-"in lataayon ko ped ke charno me lotna hi hoga." naari aaj bhi vivash hai kitni !

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